(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - कर्णपर्व


॥ श्रीः ॥
8.3. अध्यायः 003
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Topics
सञ्जयेन धृतराष्ट्रम्पति युद्धे निहतानां परेषां नामकथनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Karna Parva - Chapter Text

धृतराष्ट्र उवाच। 8-3-0x(4835)(55051)
आख्याता मामकास्तात निहता युधि पाण्डवैः।
हतांश्च पाण्डवेयानां मामकैर्ब्रूहि सञ्जय॥ 8-3-1(55052)
सञ्जय उवाच। 8-3-2x(4836)
कृतिनो युधि विक्रान्ता महासत्वा महाबलाः।
सानुबन्धाः सहामात्या गाङ्गेयेन निपातिताः॥ 8-3-2(55053)
नारायणा वल्लवाश्च रामाश्च शतशो परे।
अनुरक्ताश्च वीरेण भीष्मेण युधि पातिताः॥ 8-3-3(55054)
समः किरीटिना सङ्ख्ये वीर्येण च बलेन च।
सत्यजित्सत्यसन्धेन द्रोणेन निहतो युधि॥ 8-3-4(55055)
पाञ्चालानां महेष्वासाः सर्वे युद्वविशारदाः।
द्रोणेन सह सङ्गम्य गता वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-5(55056)
तथा विराटद्रुपदौ वृद्वौ सहसुतौ नृपौ।
पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन निहतौ रणे॥ 8-3-6(55057)
यो बाल एव समरे सम्मितः सव्यसाचिना।
केशवेन च दुर्धर्षो बलदेवेन चाभिभूः॥ 8-3-7(55058)
परेषां कदनं कृत्वा महद्रणविशारदः।
परिवार्य मदामात्रैः षड्भिः परमकै रथैः।
अशक्नुवद्भिर्बीभत्सुमभिमन्युर्निपातितः॥ 8-3-8(55059)
कृतं तं विरथं वीरं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम्।
दौःशासनिर्महाराज सौभद्रं हतवान्रणे॥ 8-3-9(55060)
पटच्चरनिहन्ता च महत्या सेनया वृतः।
अम्बष्ठस्य सुतः श्रीमान्मित्रहेतोः पराक्रमन्॥ 8-3-10(55061)
आसाद्य लक्ष्मणं वीरं दुर्योधनसुतं रणे।
सुमहत्कदनं कृत्वा गतो वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-11(55062)
बृहन्तः सुमहेष्वासः कृतास्त्रो युद्वदुर्मदः।
दुःशासनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम्॥ 8-3-12(55063)
मणिमान्दण्डधारश्च राजानौ युद्धदुर्मदौ।
पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन युधि पातितौ॥ 8-3-13(55064)
अंशुमान्भोजराजस्तु सहसैन्यो महारथः।
भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम्॥ 8-3-14(55065)
सामुद्रश्चित्रसेनश्च सह पुत्रेण भारत।
समुद्रसेनेन बलाद्गमितो यमसादनम्॥ 8-3-15(55066)
अनूपवासी नीलश्च व्याध्रदत्तश्च वीर्यवान्।
अश्वत्थाम्ना विकर्णेन गमितौ यमसादनम्॥ 8-3-16(55067)
चित्रायुधश्चित्रयोधी कृत्वा च कदनं महत्।
चित्रमार्गेण विक्रम्य विकर्णेन हतो मृधे। 8-3-17(55068)
वृकोदरसमो युद्धे वृतः केकयजो युधि।
केकयेन च विक्रम्य भ्राता भ्रात्रा निपातितः॥ 8-3-18(55069)
जनमेजयो गदायोधी पार्वतीयः प्रतापवान्।
दुर्मुखेन महाराज तव पुत्रेण पातितः॥ 8-3-19(55070)
रोचमानौ नरव्याघ्रौ रोचमानौ ग्रहाविव।
द्रौणेन युगपद्राजन्दिवं सम्प्रातितौ शरैः॥ 8-3-20(55071)
नृपाश्च प्रतियुध्यन्तः पराक्रान्ता विशाम्पते।
कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-21(55072)
पुरुजित्कृन्तिभोजश्च मातुलौ सव्यसाचिनः।
संग्रामनिर्जिताँल्लोकान्गमितौ द्रोणसायकैः॥ 8-3-22(55073)
अभिभूः काशिराजश्च काशिकैर्बहुभिर्वृतः।
वसुदानस्य पुत्रेण त्याजितो देहमाहवे॥ 8-3-23(55074)
अमितौजा युधामन्युरुत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
निहत्य शतशः सूरानस्मदीयैर्निपातिताः॥ 8-3-24(55075)
मित्रवर्मा च पाञ्चाल्यः क्षत्रधर्मा च भारत।
द्रोणेन परमेष्वासौ गमितौ यमसादनम्॥ 8-3-25(55076)
शिखण्डितनयो युद्धे क्षत्रदेवो युधाम्पतिः।
लक्ष्मणेन हतो राजंस्तव पौत्रेण भारत॥ 8-3-26(55077)
सुचित्रश्चित्रवर्मा च पितापुत्रौ महारथौ।
प्रचरन्तौ महावीरौ द्रोणेन निहतौ रणे॥ 8-3-27(55078)
वार्धक्षेमिर्महाराज समुद्र इव पर्वणि।
आयुधक्षयमासाद्य प्रशान्तिं परमां गतः॥ 8-3-28(55079)
सेनाबिन्दुसुतः श्रेष्ठः शास्त्रवान्प्रहरन्युधि।
बाह्लिकेन महाराज कौरवेन्द्रेण पातितः॥ 8-3-29(55080)
धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः।
कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-30(55081)
तथा सत्यधृतिर्वीरः कृत्वा कदनमाहवे।
पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम्॥ 8-3-31(55082)
पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपतिः।
निहत्य शात्रवान्सङ्ख्ये द्रोणेन निहतो युधि॥ 8-3-32(55083)
तथा सत्यधृतिर्वीरो मदिराश्वश्च वीर्यवान्।
सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसायकैः॥ 8-3-33(55084)
`मात्स्यादवरजः श्रीमाञ्शतानीको निपातितः।
श्रेणिमांश्च महाराज युध्यमानः पराक्रमी।
कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-34(55085)
तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परमास्त्रवित्।
भीष्मेण निहतो राजञ्शेतेऽद्य परवीरहा॥ 8-3-35(55086)
विराटपुत्रः शङ्खस्तु उत्तरश्च महारथः।
कुर्वन्तौ सुमहत्कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम्॥ 8-3-36(55087)
वसुदानश्च कदनं कुर्वाणोऽतीव संयुगे।
भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम्॥ 8-3-37(55088)
एते चान्ये च बहवः पाण्डवानां महारथाः।
हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ॥ 8-3-38(55089)

इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि तृतीयोऽध्यायः॥ 3 ॥

Mahabharata - Karna Parva - Chapter Footnotes
8-3-20 रोचमानौ एकानामानौ भ्रातरौ॥ 8-3-3 तृतीयोऽध्यायः॥


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